गाय की रक्षा में सबकी रक्षा हो जायेगी

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Published On : 2018-07-19 09:13:05

गाय की रक्षा में सबकी रक्षा हो जायेगी

गांधी जी

मैं जैसे-जैसे गोरक्षा के प्रश्न का अध्ययन करता हूं, वैसे-वैसे उसक महत्व मेरी समझ में आ रहा है। हिंदुस्तान में गोरक्षा का प्रश्न दिन-दिन गंभीर होता जाएगा, क्योंकि इसमें देश की आर्थिक स्थिति का सवाल छिपा हुूआ है। मैं मानता हूं कि हर धर्म में आर्थिक और राजनैतिक विषय रहते हैं। जो धर्म शुद्ध अर्थ (धन) का विरोधी है, वह धर्म नहीं। जो धर्म शुद्ध राजनीति का विरोधी है, वह धर्म नहीं। धर्म रहित धन त्याज्य है। धर्म के बिना राज्य सत्ता राक्षसी है। अर्थादि से अलग धर्म नाम की कोई चीज नहीं। व्यक्ति या समष्टि, सब धर्म से जीते हैं, अधर्म से नष्ट होते हैं। सत्य के सहारे किया हुआ अर्थ संग्रह यानी व्यापार जनता का पोषण करता है। सत्यासत्य के विचार से रहित व्यापार उसका नाश करता है। झूठ और छल कपट से हेाने वाला लाभ क्षणिक है। अनेक दृष्टांतों से बताया जा सकता है कि उससे अंत में हानि ही हुई है।

गोरक्षा के धर्म की जांच करते समय हमें अर्थ का विचार करना ही पड़ेगा। अगर गोरक्षा शुद्ध धन की विरोधी हो तो उसे छोड़े बिना काम नहीं चलेगा। इतना ही नहीं, हम रक्षा करना चाहेंगे तो भी रक्षा नहीं कर सकेंगे।

हमारे लिए तो प्राणी मात्र की रक्षा करना धर्म है। लेकिन जब तक सबसे उपयोगी पशु को हम सच्चे अर्थ में नहीं बचा लेते, तब तक दूसरे जानवरों की रक्षा नहीं हो सकती। हमने तो गाय की उपेक्षा कर गाय और भैंस दोनों को मौत के दरवाजे पर पहुंचा दिया है। इसलिए मैं कहता हूं कि उपयुक्त उपाय करके हम सचमुच गाय को बचा लेंगे तो दूसरे जानवर भी बच जाएंगे। लेकिन यह तभी हो सकता है जब हमें इसका सच्चा विज्ञान और अर्थशास्त्र मालूम होगा।

आज तो गाय मृत्यु के किनारे खड़ी है और मुझे यकीन नहीं है कि अंत में हमारे प्रयत्न इसे बचा सकेंगे। लेकिन गाय नष्ट हो गयी तो उसके साथ हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जाएगी। मेरा मतलब अहिंसा प्रधान ग्रामीण संस्कृति से है। इसलिए हमें दो में से एक रास्ता चुनना होगा। या तो हमें हिंसक बनकर घाटा देने वाले सब पशुओं को मार डालना होगा और उस हालत में यूरोप की तरह में दूध और मांस के लिए पशुपालन करना होगा। लेकिन हमारी संस्कृति मूल में ही दूसरी तरह की है। हमारा जीवन हमारे जानवरों के साथ ओतप्रोत है। हमारे अधिकांश देहाती अपने जानवरों के साथ एक ही घर मे रात बिताते हैं। दोनों साथ जीते हैं ओर साथ ही भूखों मरते हैं। लेकिन हमारा काम का ढंग सुधर जाए तो हम दोनों को बचा सकते हैं। नहीं तो  हम दोनों को एक साथ डूबना है और न्याय भी यही है कि साथ ही डूबे और तरें। हमारे ऋषियों ने हमें रामबाणा उपाय बात दिया है। वे कहते हैं, गाय की रक्षा करो, सबकी रक्षा हो जाएगी। ऋषि ज्ञान की कुंजी खोल गए हैं।